महिलाचक्र।

गुलाब की पंखुड़ी हु मगर हर रोज़ रौंदी जाती हूँ,
मेरी खुशबू ही हैं दुश्मन मेरी आज तुम्हे बतलाती हूँ।।

बचपन मेरा गुज़रा छोटा क्यों कि एक छोटा था मेरा भाई,
बहुत संभाला उसको और इक दिन भाभी ने कर दिया परायी।

जब खिल कर फूलो सी महकने की मेरी बारी आई,
तभी अंजान एक शख्स से तय हो गयी मेरी सगाई।

प्रौढ़पन भी गुज़रा कुछ ऐसे जैसे हो लंबी रात कोई,
सास पति और बच्चो के बीच मैं तो जैसे खो ही गयी।।

सफर लंबा था मगर फिर भी मैं चलती रही,
खुद पिघलती रही मगर मोम सी मैं जलती रही।।

पहला शब्द बन कर जिस मुख से मैं माँ कहलायी,
उसी पुत्र के मुख से बुढ़ापे में मैने ही है गाली खायी।।

अब तो सारी उम्मीद है टूटी बहुत रोती जाती हूँ,
बतला दो पता मेरा मैं खुद को खोती जाती हूँ।।

सुनो मगर ये आहट कैसी??
क्या फिर से है कोई खबर नई??
हाँ, मेरी बेटी भी एक बेटी की माँ बन गयी…..
#SelfRachit

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लिख दू ??

आखिरी आख़र तुझको आखिरी दफा लिख दू।

तेरी ही अदालत हो और तुझी पर दफ़ा लिख दू।

किताब लेकर बैठा हूँ मैं इश्क़ के हिसाब की,

शान में गुस्ताख़ी तो नही गर तेरी खता लिख दू।

तुझे शिकायत तो नही? हो तो होने दो,

मुझे फर्क नही पड़ता गर तुझे बेवफ़ा लिख दू।

गरीब आशिक़ हूँ, बजट थोड़ा कम है मेरा,

रौशनाई खत्म हो जाये जो तेरी हर जफ़ा लिख दू।

चलो छोड़ो भी अब क्या करे मुँहजोरी,

तुम मुझे राह लिख दो मैं तुम्हे मुक़ा लिख दू।

SelfRachit

…नही शामिल

मेरी ही महफ़िल में मैं ही अब नही शामिल,
मेरी ज़ुस्तज़ू में अब कोई भी मन्ज़िल नही शामिल।

इश्क़ और ज़ुर्म का होता एक ही है अंज़ाम
ऐसी कैद के लिए अब मैं हरगिज नही शामिल।

गर तुझसे जो हो पाती और मेरी इक मुलाक़ात,
बतलाता की तुझे मिलने वालों में ये पागल नही शामिल।

कोई और सितम हो तो इल्तेज़ा हैं कर दो बाक़ी,
इंतेहा पसंद लोगो मे अब मैं बिल्कुल नही शामिल।

ढूँढता हूँ खुद में ही खुद को खुद ही,
अब मेरा मुझमें में ही हैं कुछ नही शामिल।

#SelfRachit

ज़िन्दगी…

सुकून का हर एक पल धुँवा हो जाता हैं,
जवानी से जब बचपन जुदा हो जाता हैं।

मेरे नसीब का नसीब छोड़ो यारो,
मेरा तो समंदर भी कुँवा हो जाता हैं।

मुश्किलो से लाख दफा लड़ा हु मैं,
हर दफा उसका अंदाज़ जुदा हो जाता हैं।

बहुत लंबे वक्त तक चली वक़्त से मेरी जंग,
हर वक़्त मेरा वक़्त बुरा हो जाता हैं ।

मेहनताना यही मिलता हैं मुझे ज़िन्दगी का,
हर ज़ख्म हर रात भरता है हर सुबह नया हो जाता है।

#SelfRachit

छुवन…

मुझको निकली हैं कोई तरंग छूकर,
निकला हो पानी को जैसे कोई रंग छूकर…

हमेशा से बापर्दा रही हु मैं,
जाने कैसे निकल गया वो मेरा अंग छूकर…

बहुत लापरवाह हुआ करती थी मेरी हस्ती
अब तो निकला हैं मुझको कोई ढंग छूकर…

तेरे सिवा अब इसमें सफर कोई कर नही सकता,
देखी हैं मैने वो दिल की गली तंग छूकर…

कर देती हैं ये किस कदर बावरी,
देख ले तू इश्क़ को तू मेरे संग छूकर… 🙂

#SelfRachit

“आखिरी मोहब्बत…”

मैं टूटा हुआ बिखरा था

तेरे आने से ज़िंदगी मिली…

ये मेरे दिल नशी, मैं रात था

तुझसे मुझे रोशनी मिली…


 क्या कह दु की बयान हो जाये इश्क मेरा,

ठंडी हवाओ को जैसे धूप सुनहरी मिली…


बहुत मिले लोग मुझे…मिल कर गुज़र गये,

मेरे लिये ठहरने वाली तु पहली मिली…


डायरी का कोरा पन्ना थी मेरी ज़िंदगी,

तुझसे मिला तो इसे कहानी मिली…


 क्या हुआ जो ना था तेरा पहला,

मैं आखिरी हुआ…ये क्या कम खुशी मिली!!

#SelfRachit

“परिंदा…”

अपने ही वजूद पर शर्मिन्दा हुँ मैं,
घोसला छोड़ निकला परिंदा हुँ मैं…

रोकती हैं मुझे हर पल ये हवा,
अपने परो की ज़िद का पुलिन्दा हुँ मैं…

ज़मीं से उठा हुँ मैं अपने दम से,
आसमानो को लुटता दरिन्दा हुँ मैं…

भिड़ थी दुश्मनो की ज़मीं पर बहुत,
अब बादलो की बस्ती का बाशिन्दा हूँ मैं…

थम जायेगी साँसे मेरी परो के थमते,
जब तलक हवा मे हुँ… ज़िंदा हुँ मैं…

#SelfRachit

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“क्यु नही जाते…”

मेरी ज़िंदगी से ये सहारे क्यु नही जाते ?,
समन्दर से दुर किनारे क्यु नही जाते ?

ठहरे थे जो कुछ दिन आशियाने के लिये,
मेरे दिल के गाँव से ये बंजारे क्यु नही जाते ?

तोड़ चुका हुँ मैं अपनी कलम सौ दफ़ा,
मेरी गज़लो से उनके इशारे क्यु नही जाते ?

छोड़ तो दी हैं सारी ख्वाहिशे अपनी,
पर मुझसे ये ख्वाब तुम्हारे क्यु नही जाते ?

थक गयी हैं अब ये पलके मेरी,
आंखोँ से तुम्हारे नज़ारे क्यु नही जाते ?

इक अदद वक्त से कोशिश हैं सोने की,
मैं रात चाहता हूँ…ये सवेरे क्यु नही जाते ?

#SelfRachit

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“पहली मुलाकात…”

कल शाम मैं उसके पास बैठा था,
ऐसा लगा जैसे कोई खास बैठा था…

झांका जब उसकी निगाहो मे मैने,
इक शांत समन्दर मे कोई आकाश बैठा था…

देख रहा था वो मुझको मुस्कुरा कर कई दफ़ा,
मैं तो खो कर सारे होशो-हवास बैठा था…

उसकी छुवन का नशा अब तक ना गया मेरा,
मैं कल से युँही बदहवास
बैठा था…

इक मुलाकात भी कर देती हैं क्या हाल आदमी का,
मैंने ये कल जाना जब मैं उसके पास बैठा था…
☺️

#SelfRachit

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कुछ यूँ करते…

तु कहती तो तेरी आरज़ु करते,
हम भी तेरी जुस्तज़ु करते…

तुने हमे ठुकरा दिया वर्ना,
हम भी मोहब्बत रुबरू करते…

कुछ तुम कहती कुछ हम कहते,
रात भर युँही गुफ्तगू करते…

इक पल जो ठहर जाती तुम ,
हम बस ये किस्सा शुरू करते…

लिखे जाते जो मोहब्बत किस्से,
तुझे लैला करते मुझे मजनू करते…

मोहब्बतो के इन अफ़सानो मे,
हम अपनी कहानी मशहूर करते…

हमको तुमने ढीक से समझा नहीँ,
वर्ना तुम भी मोहब्बत ज़रूर करते!!

#SelfRachit

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